शीतयुद्ध जैसे हालात में सुरक्षा परिषद की सदस्यता जरूरी

वर्तमान में विश्व की स्थिति शीतयुद्ध के जमाने जैसी हो गई हैं। ऐसी स्थिति में हमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता प्राप्त करने के लिए हरसंभ‌व कोशिश करनी चाहिए। चीन हमारे खिलाफ हैं लेकिन, आसियान, जी-4, दक्षेस जैसे वैश्विक संगठनों की सहायता से भारत को विश्व मंच पर अपनी अधिकार प्राप्त करने के लिए दबाव बनाना चाहिए। भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारी कुलभूषण जाधव की रिहाई को लेकर पाकिस्तान से तो तिब्बती धर्म गुरु दलाई लामा की तवांग यात्रा को लेकर चीन के साथ रिश्तों में खटास आई है। इसे देखते हुए सुरक्षा परिषद में हमारी मौजूदगी वांछित है।
भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर के मुताबिक सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता प्राप्त करने के लिए दिए गए तमाम मानदंड पूर्ण कर लिए हैं, जिनमें लोकतंत्र और मानवाधिकारों के सम्मान की बात हैं। भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश बन गया हैं। प्रत्येक चुनाव में लाखों मतदाता निर्बाध रूप से अपने मत का प्रयोग करते हैं, वही यहां बसने वाले प्रत्येक नुमाइंदे और शरणार्थी को सम्मान मिलता हैं- दलाई लामा जिसके उदाहरण हैं। 1991 में लागू आर्थिक उदारीकरण से भारत की अर्थव्यवस्था आज विश्व की तीसरी सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था हैं। तीसरी शर्त हैं, विशाल आबादी। जनसंख्या में भारत चीन के पश्चात विश्व में दूसरा स्थान रखता हैं। विश्व की प्रमुख सैन्य शक्ति तो वह है ही।भारत भूगोल, अर्थव्यवस्था और संस्कृति के लिहाज से विश्व की विविधता की नुमाइंदगी करता हैं, जिसमें देश भौगोलिक स्थिति भी विशिष्ट हैं, जिसके दक्षिण में हिंद महासागर, पूर्व में बंगाल की खाड़ी तथा पश्चिम में अरब सागर हैं। भारत की संस्कृति में यहां सभी धर्मों की मौजूदगी के बावजूद विविधता में एकता कायम हैं। संयुक्त राष्ट्र में भारत के बजट में भी लगातार बढ़ोतरी होती जा रही हैं। सबसे बड़ी बाधा तो चीन के वीटो की है। इसके लिए हमें चीन को यह दिखाना होगा कि भारतीय बाजार का आर्थिक लाभ लेना है और आर्थिक रिश्ते बढा़ने हैं तो उसे भी अनुकूल रवैया दिखाना होगा।शौकत अली, 19
राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर
shoukatjalori786@gmail.com
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