अच्छी राजनीति व अच्छा अर्थशास्त्र है कर्ज माफी

जब लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने हाल में सरकार से तुअर दाल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के अलावा अतिरिक्त 1,000 रुपए प्रति क्विंटल बोनस की मांग की तो वे उन किसानों के लिए राहत की मांग कर रहे थे, जो कीमतों में गिरावट के कारण संकट में आ गए हैं। लगातार दो साल के सूखे के बाद 2016 में अच्छे मानसून से किसानों के चेहरे पर मुस्कान अपेक्षित थी। फिर अधिक समर्थन मूल्य के वादे के कारण किसानों ने रिकॉर्ड फसल के लिए पूरा जोर लगा दिया। किंतु बंपर फसल की खुशी थोड़े समय ही टिकी। खुले बाजार में कीमतें धड़ाम से नीचे आ गईं। एमएसपी से भी कोई आश्वासन मिलता न दिखा। 5,050 रुपए प्रति क्विंटल के समर्थन मूल्य के बदले देशभर में किसानों को 4,200 रुपए से ज्यादा भाव नहीं मिला। वह भी मंडियों में औसतन दस दिन इंतजार करने के बाद।कर्नाटक कृषि मूल्य आयोग के मुताबिक, कुल उत्पादन लागत 6,403 प्रति क्विंटल है। इसकी तुलना उस कीमत से कीजिए, जो किसानों को बाजार में मिल रही है। यह मोटेतौर पर उनके द्वारा किए निवेश से 2,000 रुपए प्रति क्विंटल कम है। स्थिति तब और खराब हो गई जब मल्लिकार्जुन खड़गे के मुताबिक इस साल सरकार ने 10,114 रुपए प्रति क्विंटल की दर पर 27.86 लाख टन तुअर दाल आयात की।इसलिए उनकी यह मांग सही थी कि सरकार इसी कीमत पर देश में भी दालों की खरीद करे। तुअर दाल अपवाद नहीं है। मूंग और चने सहित सभी दलहनों का यह भयावह हश्र हुआ है। जो दलहनों के मामले में हुआ है वही सरसों के साथ हुआ, जिसकी उपज में बुवाई का रकबा बढ़ने, बेहतर फसल और अच्छी जलवायु की बदौलत 15 फीसदी बढ़ोतरी हुई। 3,700 रुपए एमएसपी के विपरीत किसान तो प्रति क्विंटल 3,500 रुपए भी हासिल न कर सकें और कीमतें 5 से 9 फीसदी कम पर बनी रही। उत्तेजित उत्पादकों द्वारा टमाटर, आलू और प्याज को सड़कों पर फेंकने की कई घटनाएं सुर्खियां बनीं और आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की नकद फसल मिर्ची का भी यह हाल हुआ।
दुर्भाग्य से कृषि जिंसों की कीमतों में गिरावट को कभी आंकड़ों के खेल से ज्यादा महत्व नहीं दिया गया, जो साल दर साल खेला जाता रहा है। यदि आप पिछले वर्षों के अखबार देखें या गूगल में सर्च करें तो आप हर फसल आने के बाद कीमतों को गिरता पाएंगे। किंतु, जिस बात का अहसास नहीं है वह यह कि इन आंकड़ों के पीछे गरीब किसान और उनके कठोर मेहनत करने वाले परिवार हैंं, जिनकी आजीविका पर कितना घातक प्रभाव पड़ रहा है। बाजारों की नाकामी का भारतीय कृषि पर कैसा प्रभाव पड़ रहा है, वह किसानों की आत्महत्या के अंतहीन सिलसिले से स्पष्ट है।
महाराष्ट्र के लातूर में 21 वर्षीय युवती शीतल यंकट ने कुंए में कूदकर जान दे दी। सुसाइड नोट में उसने लिखा कि वह नहीं चाहती कि उसके विवाह के कारण उसके पिता और कर्ज में फंस जाएं। लगातार दो वर्षों तक उचित मूल्य न मिलने से पिता पहले ही कर्ज में थे, क्योंकि बिचौलिए किसान को ज्यादा पैसे कमाने देने के इच्छुक नहीं थे, जिससे युवती की शादी दो साल से टल रही थी। वह देख रही थी कि कैसे उसके माता-पिता कहीं से भी पैसा जुटाकर उसकी शादी करने के प्रयास में लगे थे। उसे माता-पिता पर बोझ बढ़ाने की बजाय जान देना बेहतर विकल्प लगा।
किंतु, मुझे संदेह है कि इस दारुण हकीकत का मुख्यधारा के अर्थशास्त्रियों और नीति निर्धारकों के लिए कोई अर्थ नहीं है। हर फसल के बाद कीमतें गिरने और किसान को एमएसपी दिलाने के प्रति सरकार की उदासीनता के कारण किसान कर्ज के अंतहीन दुश्चक्र में फंसते जा रहे हैं। मसलन, जब किसान तीन माह कड़ा परिश्रम करता है ताकि टमाटर की शानदार फसल हो और फिर पाता है कि कीमतें 30 से 50 पैसे प्रति किलो हैं। सरकार भी उसे बचाने आगे नहीं आती। यहां तक कि कीमतों में दखल देने के लिए बनाए 500 करोड़ रुपए के जिस फंड की हम बात करते हैं वह भी उपभोक्ता की मदद के लिए है।
गरीब किसान कर्ज में ही रहने को मजबूर हैं, जो हर साल बढ़ता ही जाता है। पंजाब में ही 98 फीसदी ग्रामीण परिवार कर्ज में डूबे हैं और इनमें से 94 फीसदी की आमदनी से ज्यादा खर्च है। दूसरे शब्दों में किसानों का संकट असल में बाजार के कारण है और बढ़ते कर्ज के साथ कर्ज माफी की मांग भी बढ़ती है। इसलिए उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने शपथ ग्रहण के तुरंत बाद 36,359 करोड़ रुपए का कृषि ऋण माफ करने का अच्छा निर्णय लिया, जिससे 92 लाख छोटे किसानों को फायदा होगा। यह अच्छी राजनीति ही नहीं, अच्छा अर्थशास्त्र भी है, यदि हम यह सोचें कि अधिकतम 1 लाख रुपए का लोन माफ करने से कितनी बच्चियों को शादी की उम्मीद हो सकती है।
इस पर अर्थशास्त्री और बिज़नेस मीडिया आंख-भौ सिकोड़ रहे हैं। विदेशी ब्रोकेरेज फर्म मेरिल लिंच ने तो एक कदम आगे जाकर यह अनुमान लगाया है कि कर्ज माफी 2019 के चुनाव तक जीडीपी के 2 फीसदी तक पहुंच जाएगी। मुझे याद नहीं आता कि मेरिल लिंच ने कभी कॉर्पोरेट लोन माफ करने पर जीडीपी के आंकड़े दिए हों। पहले ही इंडिया रेटिंग को अपेक्षा है कि निकट भविष्य में चार लाख करोड़ रुपए का कॉर्पोरेट लोन माफ कर दिया जाएगा।
चूंकि कॉर्पोरेट्स को 2013-16 के तीन साल में 17.15 लाख करोड़ की बड़ी कर रियायत दी गई और उन्हें जमीन लगभग मुफ्त इस वादे के साथ दी जाती है कि पानी-बिजली भी सस्ती मिलेगी और आयकर अवकाश तो है ही, इसलिए जानबूझकर डिफॉल्टर बनने वाले लोगों की सूची क्यों बढ़ती रहनी चाहिए? इंडियास्पेंड के मुताबिक ऐसे 5,275 डिफॉल्टरों को बैंकों को 56,521 करोड़ चुकाने हैं। किंतु न तो पिछले 13 वर्षों में यह नौ गुना वृद्धि अर्थशास्त्रियों को चिंतित करती है और न मेरिल लिंच बताती है कि यह जीडीपी का कितना है। मैंने कभी नहीं सुना कि कंपनी दिवालिया होने के बाद किसी बिज़नेसमैन ने आत्मघाती कदम उठाया हो। उनकी शान-शौकत की जीवनशैली वैसी ही बनी रहती है। हल्ला तो तभी मचता है जब किसान का लोन माफ होता है। उनसे तो शायद खुदकुशी की ही अपेक्षा रहती है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)देविंदर शर्मा
कृषि विशेषज्ञ एवं पर्यावरणविद
hunger55@mail.com
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