भरोसेमंद साथी की तलाश में मैकमास्टर की भारत यात्रा

कश्मीर के बिगड़े हालात के चलते अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एचआर मैकमास्टर का भारत दौरा काफी महत्वपूर्ण बन गया है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल, विदेश सचिव एस. जयशंकर समेत सभी से भेंट करके न सिर्फ दक्षिण एशिया में अमेरिकी हितों के विभिन्न पक्षों को स्पष्ट किया है बल्कि भारत का पक्ष भी जाना है। वे अफगानिस्तान और पाकिस्तान होते हुए भारत आए हैं और अगर उनके लिए अफगानिस्तान में बढ़ता आतंकवाद चिंता की बात है तो पाकिस्तान में बढ़ते आतंकी गुट और उनका अपने विरुद्ध इस्तेमाल भारत की चिंता का विषय है। भारत ने मैकमास्टर से कहा है कि कश्मीर के मौजूदा हालात के लिए पाकिस्तान काफी हद तक जिम्मेदार है। इस बारे में मैकमास्टर ने उचित सलाह ही दी है कि पाकिस्तान को अपने हितों के लिए राजनयन का इस्तेमाल करना चाहिए न कि आतंकवाद का। अमेरिका पाकिस्तान को तो नहीं छोड़ सकता लेकिन, वह दक्षिण एशिया में भारत के रूप में विश्वसनीय सहयोगी ढूंढ रहा है। पिछले बीस वर्षों में विभिन्न वार्ताओं और संधियों के माध्यम से भारत अमेरिका के करीब गया है। इसमें स्ट्रोब टालबोट से जसवंत सिंह की बातचीत से लेकर डॉ. मनमोहन सिंह और बुश के बीच हुई परमाणु संधि प्रमुख हैं। बल्कि, इस बीच भारत अमेरिका के इतना करीब चला गया है कि रूस जैसा भारत का पारम्परिक मित्र पाकिस्तान की ओर खिसक गया है। अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प जो आरंभ में रूस के प्रति नरम दिख रहे थे वे अब उससे छिटक रहे हैं और उन्हें पाकिस्तान और अफगानिस्तान में रूस की बढ़ती दखल से दिक्कत भी हो रही है। फिलहाल अमेरिका की दक्षिण एशिया में ताजा सक्रियता का एक मकसद भारत और पाकिस्तान की रुकी हुई वार्ता को शुरू करवाना भी हो सकता है लेकिन, यह तभी हो सकता है, जब पाकिस्तान आतंकवाद का निर्यात बंद करे, 26/11 के अपराधियों को दंडित करे और कुलभूषण जाधव की फांसी को रद्‌द करे। हालांकि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ स्वयं भ्रष्टाचार के मुकदमे में किसी सजा का इंतजार कर रहे हैं और अगर वैसा कुछ होता है तो पाकिस्तान की राजनीतिक स्थिरता फिर प्रभावित होगी। इस अनिश्चित राजनीतिक स्थिति में अमेरिकी दखल जरूर कोई रास्ता निकाल सकती है।
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