चीन को धमकाने वाला रवैया छोड़ना होगा

भारत और चीन के बीच बीते महीनों में रिश्ते गर्मजोशी भरे नहीं रहे हैं लेकिन, हाल ही में इसमें बर्फ जैसा ठंडापन आ गया है। दलाई लामा की अरुणाचल यात्रा पर चीनी नेता आगबबुला हैं। यह वह इलाका है जिस पर चीन दावा करता है। चीन की ओर से मुखर विरोध के बीच 8 अप्रैल को दलाई लामा ने दूर-दूर से आए श्रद्धालुओं को सीमावर्ती कस्बे तवांग के एेतिहासिक मठ में संबोधित किया, जहां छठे दलाई लामा का तीन सदी से भी अधिक पहले जन्म हुआ था।
भारत और चीन दलाई लामा और अरुणाचल प्रदेश को बहुत भिन्न तरीके से देखते हैं। भारतीय दृष्टिकोण से दलाई लामा तिब्बती बौद्ध समुदाय के आध्यात्मिक प्रमुख हैं और इसलिए उन्हें तिब्बती बौद्धों के तवांग स्थित महान मठ में अपने अनुयायियों को संबोधित करने का पूरा अधिकार है। चूंकि अरुणाचल प्रदेश भारतीय संघ का राज्य है, वहां जो भी होता है, उस पर सिर्फ भारत का फैसला ही चल सकता है। लेकिन चीन की दृष्टि में अरुणाचल प्रदेश वास्तव में भारत का है ही नहीं। हां, अधिकृत रूप से यह भारत का है सिर्फ इसलिए कि यह ब्रिटिश साम्राज्यवादियों द्वारा 1911 में निर्धारित सीमा रेखा मैकमहोन लाइन के भीतर है, जो चीन को स्वीकार नहीं है (हालांकि चीन ने इसी रेखा के आधार पर म्यांमार से अपना सीमा विवाद सुलझा लिया है।) चीन का कहना है कि दलाई लामा आध्यात्मिक नहीं, सिर्फ राजनीतिक नेता हैं। तिब्बतियों के स्वायत्त शासन को उनका समर्थन देखते हुए (चीनी उन्हें गुस्से में ‘अलगाववादी’ कहते हैं) संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्र में उनकी यात्रा को चीन उकसावे की कार्रवाई मानता है। चीनी प्रवक्ता के मुताबिक दलाई लामा को अरुणाचल प्रदेश की यात्रा की अनुमति देने से द्विपक्षीय रिश्तों को नुकसान पहुंचेगा और भारत को इसके ‘नतीजे भुगतने’ पड़ेंगे। चीन ने औपचारिक विरोध दर्ज कराने के लिए भारतीय दूत विजय गोखले को बुलाया था।
भारत ने सुलह-सफाई वाला रवैया अपनाया है। विदेश मंत्रालय ने पहले तो यह कहकर चीन को शांत करने की कोशिश की कि दलाई लामा की धार्मिक व आध्यात्मिक गतिविधियों को कोई रंग नहीं दिया जाना चाहिए। चीन की बढ़ती तैशी के चलते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने ‘वन-चाइना’ नीति के प्रति अपने सम्मान पर जोर दिया और चीन सरकार से आग्रह किया कि वह ‘कृत्रिम विवाद’ पैदा नहीं करे। किंतु, चीन शांत नहीं हुआ बल्कि जब दलाई लामा अरुणाचल प्रदेश में आए तो चीन के अधिकृत मीडिया ने घोषणा की कि चीन ‘कड़े कदम उठाने पर मजबूर’ हो सकता है। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा प्रकाशित अंग्रेजी टैबलाइड ‘द ग्लोबल टाइम्स,’ पार्टी मुखपत्र ‘पीपल्स डैली’ ने खासतौर पर धमकाने वाला स्वर अपना लिया। इसमें चीन के भारत से कई गुना अधिक जीडीपी और उसकी सैन्य क्षमताओं का उल्लेख किया गया ‘जो हिंद महासागर’ पहुंच सकती है। कश्मीर से निकटता का भी जिक्र था। पूछा गया, ‘यदि चीन भारत के साथ भू-राजनीतिक खेल खेलने लगे तो कौन जीतेगा?’
ग्लोबल टाइम्स के संपादकीय में जोर देकर कहा गया कि दलाई लामा की यह अरुणाचल यात्रा पहले हुई छह यात्राओं से भिन्न है -अंतिम यात्रा 2009 में हुई थी- क्योंकि इस बार उनकी अगवानी भारत के गृह राज्यमंत्री किरन रिजीजू ने की और वे उनके साथ भी रहे। भारत को किसी महत्वपूर्ण आध्यात्मिक अवसर पर अरुणाचल के राजनेता के रूप में किरन रिजीजू की वहां मौजूदगी में कुछ भी असामान्य नहीं लगता।
किंतु, चीन रिजीजू की मौजूदगी को आयोजन के राजनीतिक होने का सबूत मानने को तरजीह देता है। उसका संकेत था कि भारत ने इस यात्रा का इस्तेमाल चीन पर दबाव डालने के राजनयिक औजार के रूप में किया है। ग्लोबल टाइम्स ने जोर देकर कहा, ‘मूल तथ्य यह है कि दलाई लामा ‘चीनी राजनय में अत्यधिक राजनीतिकृत प्रतीक है’ इतना कि किसी देश का उनके प्रति रवैया चीन के साथ उसके लगभग ‘पूरे रिश्तों’ को प्रभावित करता है।’ फिर भी चीन को यह समझना चाहिए कि हाल के वर्षों में उसने भारत सरकार को कोई ऐसी वजह नहीं दी है कि वह उसकी संवेदनशीलता का ख्याल रखे।सच तो यह है कि उसने उस तक पहुंचने के मोदी के कई प्रयासों पर अपमानजनक प्रतिक्रिया ही दी है। मसलन, 2014 में मोदी ने न सिर्फ चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का अपने गृहनगर अहमदाबाद में अपने जन्मदिन पर स्वागत किया बल्कि उसी यात्रा में उन्होंने पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा बंदरगाह और दूरसंचार जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में चीन निवेश पर लगाई पाबंदियां भी हटा लीं। तुरंत ही चीनी सैनिकों ने लद्‌दाख में विवादास्पद सीमा का उल्लंघन कर दिया और वहां टेन्ट तक लगा दिए। उस छोटे संकट के बाद नीतिगत झटके देने वाली पूरी शृंखला सामने आई, जिससे पता चला कि विभिन्न मुद्‌दों पर भारत की संवेदनशीलता के लिए चीन को जरा भी सम्मान नहीं है। परमाणु आपूर्ति समूह (एनएसजी) में भारत के प्रवेश का विरोध। फिर जैश ए मोहम्मद (पाकिस्तानी गुट) के सरगना मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की काली सूची में डालने के भारत के अनुरोध को रोका, जबकि इस पहल को परिषद के 14 अन्य देशों का समर्थन था। चीन ने पाक अधिकृत कश्मीर में ‘चीन-पाक आर्थिक गलियारा’ भी निर्मित किया है, जबकि चीन खुद उस क्षेत्र को विवादास्पद मानता है। फिर भी उसने भारत की आपत्ति की अनदेखी की।
इस पृष्ठभूमि में चीन की यह अपेक्षा कि भारत उसकी संवेदनशीलता का सम्मान करेगा अतिशयोक्ति ही होगी। चीन का अहंकारी रवैया नया नहीं है। उसका यह व्यवहार दक्षिण चीन समुद्र में उसके व्यवहार से मिलता है, जहां चीन का जोर है कि संप्रभुता उसकी ‘नाइन-डेश-लाइन’ से तय होनी चाहिए और दूसरे देशों को झुकना चाहिए जैसा कि राष्ट्रपति रोड्रिगो दुदेर्ते के तहत फिलिपीन्स ने किया। चीन यह दिखाने को आतुर है कि जो नहीं मानते वह उन पर दबाव डाल सकता है जैसा कि जापान व वियनताम के साथ हुआ है। लेकिन, चीन के अन्य क्षेत्रीय पड़ोसियों की तुलना में भारत कुछ बड़ा है और वह अलग मिट्‌टी का बना है। दलाई लामा की यात्रा पर टकराव बढ़ाने की बजाय चीनी नेताओं को भावनाएं शांत होने देना चाहिए। इसकी बजाय वे धमकाने वाला अंदाज ही बनाए रखते हैं तो उन्हें पता चल जाएगा कि भारत के पास भी चलने के लिए अपने पत्ते हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)शशि थरूर
विदेश मामलों की संसदीय समिति के चेयरमैन और पूर्व केंद्रीय मंत्री
Twitter@ShashiTharoor
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