राज्यसभा को दरकिनार करना, लोकतंत्र के लिए खतरा

करंट अफेयर्स पर 30 से कम उम्र के युवाओं की सोच-सशक्त लोकतंत्र की दीर्घायु के लिए सक्रिय विपक्ष की भूमिका बहुत आवश्यक होती है। वही सत्तारूढ़ सरकार के फैसले से होने वाले दुष्परिणामों का आकलन कर सदन को अवगत कराता है। सत्तारूढ़ दल को संवैधानिक मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है। किंतु आज विपक्ष कमजोर होता जा रहा है। इसके पूर्व भी नगण्य विपक्ष के साथ संसद चली है। आपातकाल का दौर छोड़ दें तो कमोबेश सरकारों ने लोकतांत्रिक परम्पराओं का सम्मान किया है। किंतु जो छोटी-छोटी बातों पर लोकतंत्र की दुहाई देते थे, सत्ता मिलते ही लोकशाही को कमजोर कर हिटलरशाही पसंद कर रहे हैं। यह चिंता का विषय है।
भारतीय संविधान में देश को तानाशाही लोकतंत्र से बचाने के लिए ही द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका का प्रावधान कर उच्च सदन (राज्यसभा) को जरूरी महत्व प्रदान किया गया। हालांकि, आज उग्र राष्ट्रवाद की चकाचौंध में राज्यसभा को निष्प्रभावी बनाने का षड्यंत्र किया जा रहा है। विपक्ष जब शून्य हो जाए तो यही होगा। इसका साक्षात नमूना आधार बिल पर सरकार के रुख से ही पता चलता है। आधार बिल कहीं से भी वित्त विधेयक नहीं है, फिर भी सरकार उसे वित्त विधेयक के अंतर्गत पेश कर रही है, ताकि राज्यसभा उसके प्रावधानों को न रोक सके। फाइनेंस बिल में कम से कम 40 ऐसे बिंदु हैं, जिन्हें संवैधानिक तौर पर फाइनेंस बिल का हिस्सा होना ही नहीं चाहिए। करारोपण, सरकार द्वारा उधार लेने, कंसॉलिडेटेड फंड में से खर्च या प्राप्ति इनसे जुड़े मामलों के प्रावधान वाला बिल ही फाइनेंस बिल कहलाता है।
वित्तमंत्री जेटली का कहना है कि चूंकि सरकारी सब्सिडी वाली योजनाओं का पैसा आधार के जरिये ही आवंटित होगा, इसलिए इसे वित्तीय बिल कहना ठीक है। विपक्ष का कहना है कि सरकार को राज्यसभा में प्रश्न पूछे जाने का भय है तो वे राज्यसभा को दरकिनार करना चाहते हैं। ऐसा इसीलिए संभव है, क्योंकि लोकसभा में कोई विपक्ष है ही नहीं। काश! हम लोकतंत्र के सामने उपस्थित खतरे से समय रहते सचेत हो पाएं।देवेंद्रराज सुथार, 20
जगनारायण व्यास विवि, जोधपुर
devendrasuthar196@gmail.com

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