अफगानिस्तान में अमेरिकी बमबारी निरापद नहीं

अमेरिका ने अफगानिस्तान में आईएस के ठिकाने पर अपना सबसे बड़ा गैर-एटमी एमओएबी बम गिराकर आतंकियों को तो धमकाया ही है, दुनिया को अपना नया तेवर भी दिखाया है। यह तेवर उसकी नई अफगानिस्तान-पाक नीति की झलक है, जिसमें नए सिरे से इस इलाके में आक्रामक उपस्थिति बनाने की पहल देखी जा सकती है। सीरिया पर मिसाइल हमले के हफ्तेभर के भीतर हुआ यह हमला जहां अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की चुनावी आक्रामकता को हकीकत में बदलते हुए दिखाता है, वहीं इसके उद‌्देश्य और उपलब्धि को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। अफगानिस्तान में गिराए गए इस बम से 36 आतंकियों के मारे जाने का दावा किया गया है और व्हाइट हाउस के प्रवक्ता सान स्पाइसर ने यह भी कहा है कि इस हमले में आम आदमी को क्षति नहीं हुई है। दूसरी तरफ अपुष्ट सूत्रों से खबरें आ रही है कि इसमें कुछ नागरिक मारे गए हैं। मारे जाने वालों में महिलाओं और बच्चों के होने का भी दावा किया जा रहा है। हालांकि, इस हमले की वजह और उसके लिए दिए गए आदेश को लेकर आरंभ में परस्पर विरोधी दावे भी किए गए थे। एक दावा यह है कि अमेरिकी कमांडर मार्क डी एलनकार के मारे जाने के बाद ऐसा घातक आक्रमण किया गया है। दूसरा दावा यह है कि इस बारे में ट्रम्प को बाद में जानकारी दी गई है। राष्ट्रपति ने अपनी जानकारी होने की बात मान ली है लेकिन, यह सवाल अभी भी उठ रहे हैं कि क्या गैर-एटमी हथियार के इस्तेमाल में राष्ट्रपति की अनुमति आवश्यक है? पर अफगानिस्तान के राष्ट्रपति ने हमले को आतंकवाद नहीं अफगानियों के विरुद्ध कार्रवाई बताया है। इस हमले से आतंकवाद को कुछ नुकसान जरूर होगा लेकिन, इससे न तो उसका सामरिक समाधान निकलेगा और न ही राजनीतिक। इसलिए इसे अमेरिकी प्रभुत्व कायम करने की कार्रवाई माना जा सकता है। इससे अमेरिका परमाणु विस्फोट को आतुर उत्तर कोरिया को तो धमकाना चाहता है, साथ में रूस के लिए भी कुछ सबक देना चाहता है। पहले रूस के लिए नरम और नाटो के लिए गरम दिखने वाले ट्रम्प ने दो दिनों में रणनीति बदली है और अब वे नाटो और चीन के करीब जाना चाहते हैं। भारत के लिए विशेष सतर्कता जरूरी है, क्योंकि अफगानिस्तान में भारतीय हित काफी गहरे हैं। आतंकियों पर कार्रवाई तो भारत के हित में है लेकिन, अफगानी और भारतीय नागरिकों की हानि उल्टा असर डालेगी।
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