संविधान के अनुकूल नहीं है संघ प्रमुख की दलील

राम मंदिर के बारे में रांची में दी गई राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत की दलील न तो संविधान सम्मत है और न ही सद्‌भाव सम्मत। यह कहना कि राम मंदिर का विरोध अन्य धर्मों की कट्‌टरपंथ के नाम पर चलने वाली गुंडागर्दी है, एक तरफ नियम-कानून से चलने वाले देश के अल्पसंख्यकों को धमकाने का प्रयास है तो दूसरी तरफ देश के बहुसंख्यक समाज को उकसाने की कोशिश है। हालांकि उन्होंने इसी बयान के साथ यह भी कहा है कि राम मंदिर का विरोध न तो इस्लाम कर रहा है और न ही ईसाइयत, वह विरोध तो धर्म के नाम पर राजनीति करने वाले गुंडे कर रहे हैं। यह भोलेपन में दिया गया ऐसा खतरनाक बयान है जो इस देश के संविधान और उसकी संस्थाओं की अवहेलना भी है।सबसे पहले तो यह समझना होगा कि राम मंदिर की मांग हिंदू धर्म नहीं कर रहा था बल्कि हिंदुओं के राजनीतिकरण के लिए काम करने वाला एक संगठन कर रहा था। यह बात बार-बार कही गई है कि अगर अयोध्या के स्थानीय लोगों के जिम्मे विवाद को छोड़ा गया होता तो उन्होंने इसे सुलझा लिया होता। सारी गड़बड़ी तब हुई है जब उसमें बाहरी और बड़े संगठनों का हस्तक्षेप हुआ और एक ऐतिहासिक विवाद को इतिहास के माध्यम से हल करने की बजाय धार्मिक भावनाओं और आस्था के लिहाज से हल करने की कोशिश की गई।विडंबना यह है कि इस देश के मीडिया को ही नहीं समाज को भी धीरे-धीरे स्मृतिभ्रंश होता जा रहा है और वह यह भूलता जा रहा है कि छह दिसंबर 1992 को किस संगठन ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना करते हुए दिनदहाड़े बाबरी मस्जिद को ढहाया था और पूरे देश को दंगों में झोंक दिया था। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बाबरी मस्जिद की रक्षा में कोई मुस्लिम संगठन अपना दल-बल लेकर नहीं खड़ा था। इस रास्ते में अगर कोई अड़चन है तो इस देश का संविधान और उसके धर्मनिरपेक्षता और सद्‌भाव के सिद्धांत।अल्पसंख्यक समाज और देश के संविधानवादी लोगों का प्रयास यही है कि देश में आस्था के नाम पर हिंसा की नज़ीर न कायम हो और संविधान और उसकी संस्थाएं बहुसंख्यक समाज के भय में काम करने की बजाय समाज के सभी तबकों के सम्मान और सद्‌भाव के लिए काम करें।
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