मोटर वाहन कानून में सुधार के साथ सुरक्षा संस्कृति जरूरी

सरकार ने मोटर वाहन अधिनियम में कई महत्वपूर्ण संशोधन करके सड़क सुरक्षा को कारगर बनाने का प्रयास तो किया है लेकिन, असली सवाल यह है कि क्या हमारे नागरिक, बाजार की संस्थाएं और खुद सरकार उसे स्वीकार करने को तैयार हैं? कुछ संशोधन तो लागू होकर ही रहेंगे जैसे कि गाड़ियों के लाइसेंस को आधार कार्ड से जोड़ना और आरटीओ पर निर्भरता घटाकर ऑनलाइन पंजीकरण कराना ताकि चोरी जाने वाली गाड़ियों का फिर पंजीकरण न हो सके। इस संशोधन के तहत न सिर्फ लाइसेंस प्रणाली को आधार कार्ड से जोड़ा जाएगा बल्कि देश की सभी गाड़ियों का एक केंद्रीय आंकड़ा बैंक तैयार किया जाएगा। लेकिन, इसका एक चिंताजनक पहलू गाड़ियों का प्रयोग करने वालों की निजता और उनके नागरिक अधिकारों का है और राष्ट्रीय स्तर पर आंकड़े उपलब्ध होने के चलते उन अधिकारों का उल्लंघन होने का खतरा कायम है। दूसरा संशोधन तीसरे पक्ष के बीमा के बारे में है, जिसमें मुआवजे की राशि बढ़ाई गई है ताकि हादसा होने पर प्रभावित पक्ष को राहत पहुंचाई जा सके। इस बारे में बीमा कंपनियों और गाड़ी मालिकों की ईमानदारी को भी कायम करने की जरूरत है, क्योंकि बीमा के तहत कई बार जरूरतमंद लोग मुआवजा नहीं उठा पाते लेकिन, पहुंच वाले लोग मामूली हादसे में भी भारी राशि वसूल लेते हैं। यह कार्य तभी संभव है, जब सरकार और बाजार में काम करने की जवाबदेह और पारदर्शी संस्कृति का विकास हो। संशोधन का तीसरा पहलू यातायात के नियमों के उल्लंघन पर कठोर दंड दिए जाने का है। क्या नियम कड़े कर दिए जाने से लोग यातायात के नियमों का उल्लंघन नहीं करेंगे? इसका सीमित असर ही पड़ता है। कानून को लागू करने वाली एजेंसियों की सामर्थ्य इतनी कम है कि वे देश की सभी सड़कों के हर बिंदु पर कानून लागू करवाने के लिए उपलब्ध नहीं हो सकतीं। दूसरी तरफ भारतीय नागरिकों का स्वभाव आमतौर पर यातायात के कानून तोड़ने का है और वे सुरक्षा के लिए जरूरी उपायों को अपनाने में भी अपनी तौहीन समझते हैं। भारतीय वाहन चालक न तो सड़कों पर लोकतंत्र चाहते हैं और न ही नियम कानून का पालन। वे सड़कों को एक रोमांचक स्थली के रूप में देखते हैं और यात्रा के साथ दुस्साहस का भी प्रदर्शन करना चाहते हैं। इसलिए मोटर वाहन कानून तभी सार्थक होगा जब देश के नागरिक उसके साथ सुरक्षा की संस्कृति विकसित करें।
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