सिर्फ जासूसी का मामला नहीं है जा‌धव को सजा

कुछ समय पहले जब पाकिस्तान ने घोषणा की थी कि उसने भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ के लिए काम करने वाले एक भारतीय जासूस को गिरफ्तार किया है, भारत में किसी ने इसे ज्यादा तवज्जो नहीं दी। नौसेना के पूर्व अधिकारी कुलभूषण जाधव को पाकिस्तानी एजेंसियों ने संदिग्ध परिस्थितियों में उठवा लिया। ऐसी घटनाएं विवादित रिश्तों वाले देशों के साथ होती हैं। लेकिन, इस तरह निरुद्ध या गिरफ्तार किए व्यक्ति को फील्ड जनरल कोर्ट मार्शल (एफजीसीएम) के सामने पेश कर मौत की सजा सुनाने से ऐसा तूफान खड़ा हो सकता है, जिसकी पाकिस्तान ने कल्पना नहीं की होगी।
कानून का मेरा सीमित ज्ञान बताता है कि एफसीएम, भारत के एसजीसीएम जैसी ही व्यवस्था है। हमारे यहां ‘फील्ड’ शब्द की जगह ‘समरी’ शब्द है। वैसे जीसीएम फील्ड की परिस्थितियों के मुताबिक चलाने के लिए आरक्षित तो हैं लेकिन, इसके लिए उच्चस्तरीय अधिकारी की अनुमति भी आवश्यक है। हमारे यहां आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल है, जिसमें एक सिविल जज और सेवानिवृत्त वरिष्ठ सैन्य अधिकारी होता है। पाकिस्तान में मिलिट्री अपीलेट ट्रिब्यूनल नामक संस्था है, जिसमें सिर्फ सेवारत अधिकारी ही होते हैं। जाहिराना तौर पर जाधव पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट में जा सकते हैं और राष्ट्रपति से भी गुहार लगा सकते हैं। लेकिन, पाकिस्तानी सेना प्रमुख का रुतबा देखते हुए यह संदेहास्पद ही है कि एेसा कुछ होगा। पूरे सालभर जाधव को उच्चायोग की पहुंच से दूर रखा गया। जाधव सालभर से ज्यादा पाकिस्तानी हिरासत में हैं। यह काउंसलर रिलेशन्स पर वियना प्रोटोकॉल का घोर उल्लंघन है, जिसमें विदेशों में गिरफ्तार व्यक्तियों की सुरक्षा के लिए प्रक्रिया तय की गई है। सच तो यह है कि इस मुकदमे को सिर्फ पाकिस्तानी सेना प्रमुख ने मंजूरी दी है। अजीब बात तो यह है कि उन्हें सेवारत सैन्य अधिकारी मानकर पाकिस्तानी सैन्य कानून लागू किया गया। यह सब इतना संदिग्ध है कि किसी अंतरराष्ट्रीय जांच में आरोप कभी ठहर ही नहीं सकते। हालांकि, यह बात भी सच है कि हम असाधारण रूप से अतार्किक देश से निपट रहे हैं, जिसे पाकिस्तान कहते हैं। वहां हर तरह की अतार्किकता की अपेक्षा की जा सकती है, जिसमें वृहत रणनीतिक खेल के प्यादे के रूप में शायद कुलभूषण जाधव की सजा पर जल्द ही दुर्भाग्यपूर्ण अमल भी शामिल है।
जाधव की गिरफ्तारी की परिस्थितियों की कोई सफाई नहीं दी गई है, जहां तक कि जगह भी उजागर नहीं की गई है। कहा जा रहा है कि तालिबान ने उनका अपहरण करके उन्हें आईएसआई को बेच दिया। ऐसी कई तरह की बातें चर्चा में हैं। प्राथमिक रूप से यह ज्ञात है कि जाधव अब नौसेना के सक्रिय अधिकारी नहीं हैं। उन्होंने 2001 में समय-पूर्व सेवानिवृत्ति ले ली थी। वे अब बिज़नेसमैन हैं और चाबहार में पाल से चलने वाली नौकाएं चलाते हैं। पाकिस्तान ने उन पर सक्रिय रॉ एजेंट होने का आरोप लगाता है, जो बलूचिस्तान में उपद्रव फैलाने और चीन पाक आर्थिक कॉरिडोर (सीपीईसी) को निशाना बनाने के लिए छिपे मिशन पर थे। गिरफ्तारी, आरोप और फैसला सुनाने की जल्दी इन सबके कारण हैं। 3 मार्च 2016 को जब जाधव को गिरफ्तार किया गया तो भारत चाबहार का मुद्‌दा बहुत शिद्‌दत से आगे बढ़ा रहा था ताकि बाद में होने वाली प्रधानमंत्री मोदी की तेहरान यात्रा में करार पर दस्तखत हो सकंे। इससे पाकिस्तान बहुत चिंता में पड़ गया, क्योंकि यह अफगानिस्तान, मध्य एशिया और रूस के उत्तर-दक्षिण कॉरिडोर तक पहुंचने का भारत का रणनीतिक कदम था। पाकिस्तान का महत्व कम होने जा रहा था। उसने ईरानी नेतृत्व के दिमाग में यह शक पैदा करने के लिए परोक्ष हथकंडे का इस्तेमाल किया कि भारत की मौजूदगी से बलूच लोगों को अधिक समर्थन मिलेगा, जिनका एक बड़ा तबका ईरान में है। साथ में चीन के योजनाकारों के दिमाग में यह बैठाने का प्रयास था कि भारत सीपीईसी को निशाना बनाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है ताकि चीन को भारत से अधिक दूर किया जा सके।
हालांकि, पाकिस्तान में ईरान के राजदूत और क्षेत्र के कई अन्य कूटनीतिक हलकों ने जाधव को क्लीन चिट दी लेकिन, जाधव पाक के लिए उचित समय पर भुनाने के लिए एकदम सही प्यादे थे। कथित जासूसी के मामलों का बरसों तक चलते रहना कोई असाधारण बात नहीं है। परंतु जाधव का मामला रणनीतिक फायदों के लिए जानबूझकर रचा गया षड्यंत्र है। चाबहार या पाक-ईरान सीमा के पास के किसी भी ईरानी शहर में काम कर रहा कोई भी भारतीय अपहरण के लिए ठीक होता पर खोजबीन करने से आईएसआई को पूर्व सेना अधिकारी जाधव मिल गए, जो उसकी साजिश के एकदम योग्य थे। इस सबको छिपाकर रखने के लिए उन्हें सेवारत भारतीय खुफिया अधिकारी बताया गया और पाकिस्तानी आर्मी एक्ट की अजीब-सी व्याख्या उन पर लागू कर दी गई। टेलीविजन पर पाकिस्तान इंटर सर्विसेस पब्लिक रिलेशन्स ने जो जाधव का जो इकबालिया बयान दिखाया वह टूटते वाक्यों और काट-छांटकर दिखाने से नौटंकी ही बन गई थी।
अब इस घिनौने नाटक का दूसरा भाग सामने आया है। फैसला और इसमें सुनाई गई सजा के अलावा परिस्थितियों पर भी गौर किया जाना चाहिए। हालांकि, पाकिस्तान में ओवरटाइम काम कर रहा रणनीतिक दिमाग या कई दिमाग हर उस मौके की तलाश में है, जिससे भारत और चीन के बीच अलगाव बढ़ाया जा सके। अरुणाचल प्रदेश में दलाई लामा की यात्रा से चीन गुस्से में है तो यही वक्त है कि चीन को पाक-चीन आर्थिक गलियारे को नुकसान पहुंचाने का भारत का कथित इरादा याद दिला दिया जाए। वह भारत में भी यह संदेश भेजना चाहता है कि उसके पास इतनी रणनीतिक स्वतंत्रता है कि भारत अपने ही नागरिक को नहीं बचा पा रहा है। भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो मजबूती मिली है, खासतौर पर हाल के विधानसभा चुनावों के बाद, पाकिस्तान उसे कश्मीर में हिंसा भड़काकर और खराब छवि निर्मित करके कमजोर करना चाहता है। उस स्थिति में हम पाकिस्तान के साथ फिर बड़ी मुठभेड़ को सामने पा रहे हैं। उम्मीद करें कि इस्लामाबाद या यह कहना सही होगा कि रावलपिंडी में विवेकपूर्ण सोच की विजय होगी।(ये लेखक के अपने विचार हैं।)सैयद अता हसनैनलेफ्टि.जन (रिटायर्ड), कश्मीर में सेना की 15वीं कोर के पूर्व कमांडर
atahasnain@gmail.com
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