विजय और पराजय के बीच राजनीति के दो ध्रुव

भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का रात्रिभोज तथा कांग्रेस के समन्वय में विपक्ष की दो महत्वपूर्ण बैठकों और ईवीएम मशीन में गड़बड़ी को मुद्‌दा बनाने का फैसला भारतीय राजनीति के विजय और पराजय के बीच झूल रहे दो ध्रुवों की ताजा सच्चाई है और उम्मीद की जानी चाहिए कि भावी राजनीति के कुछ सूत्र इसमें से निकलेंगे।निश्चित रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए का आत्मविश्वास शिखर पर है और वह इसे मजबूती और विस्तार देने के लिए जो बैठक करने जा रहा है उससे एक बात स्पष्ट लग रही है कि वह पस्तमाल पड़े विपक्ष को किसी भी तरह का मौका नहीं देने वाला है। एनडीए चाहता है कि उसका 32 दलों का कुनबा और बढ़े साथ ही आगामी राष्ट्रपति चुनाव और 2019 के चुनावों में वह विजय की नई ऊंचाई हासिल करे। यहां एक बात जरूर ध्यान देने लायक है कि मोदी के नेतृत्व के चमत्कारिक प्रभाव और भाजपा की बढ़ती मजबूती के बावजूद इस संगठन ने अन्य दलों को दरकिनार करने की बजाय अपना विस्तार करने की सोची है। स्पष्ट तौर पर यह कांग्रेस की उस सोच से अलग है, जिसमें लंबे समय तक कांग्रेस एकला चलो की नीति पर ही यकीन करती थी।एनडीए अभी भी कोई छोटा कुनबा नहीं है, लेकिन अगर देर-सबेर नीतीश कुमार की पार्टी भी उसका हिस्सा बने तो ताज्जुब नहीं होना चाहिए। लेकिन, जिस तरह से कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों ने राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष गुलाम नबी आजाद के कक्ष में बैठक की और ईवीएम मशीन में गड़बड़ी को मुद्‌दा बनाने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त से मिलने का निर्णय लिया है उससे लगता है कि विपक्ष को उसी प्रकार एकता का महत्व समझ में आ रहा है जैसे इंदिरा गांधी के कार्यकाल में भाजपा और जनता दली परिवार को समझ में आया था।हालांकि, ईवीएम मशीन को लेकर अभी तक गड़बड़ी के ठोस प्रमाण नहीं मिले हैं लेकिन, मायावती और अरविंद केजरीवाल जैसे नेताओं ने जब उस पर कड़े बयान दिए हैं तो कांग्रेस ने इसे उठाकर विपक्षी एकता के कारक को सुदृढ़ करने की रणनीति बनाई है। कई बार मुद्‌दों से ज्यादा दलों का एक साथ बैठनाऔर बयान देना महत्वपूर्ण होता है। यह हलचल भारतीय लोकतंत्र के लिए भी जरूरी है, क्योंकि विपक्ष विहीन लोकतंत्र न तो जनता के प्रति संवेदनशील होता है और न ही मूल्यों और संस्थाओं के प्रति।
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